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अथर्ववेद

Kanda 6 • Sukta 127 • Mantra 3

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 6 • सूक्त 127 • मन्त्र 3

6.127.3

Mantra ID: 6.127.3

यो अङ्ग्यो॒ यः कर्ण्यो॒ यो अ॒क्ष्योर्वि॒सल्प॑कः । वि वृ॑हामो वि॒सल्प॑कं विद्र॒धं हृ॑दयाम॒यम् । परा॒ तमज्ञा॑तं॒ यक्ष्म॑मध॒राञ्चं॑ सुवामसि ॥ (३)

ॐ

शास्त्र जिज्ञासा: इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

अथर्ववेद मन्त्र 6.127.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

॥ वैदिक संदर्भ ॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हमारे हाथ, पैर आदि अंगों में, कानों में और आंखों में जो विसर्पक हैं, उन्हें मैं जड़ से उखाड़ता हूं. मैं विदध्रि को, हृदय रोग को तथा अज्ञात स्वरूप वाले यक्ष्मा रोग को भी नीचे की ओर विमुख करता हूं. (३)

EN English Translation

I root out the creepers in our hands, feet, etc., in the ears and in the eyes. I also turn down the disease of electricity, heart disease and tuberculosis of unknown nature. (3)

शास्त्र जिज्ञासा
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