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अथर्ववेद

Kanda 6 • Sukta 47 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 6 • सूक्त 47 • मन्त्र 2

6.47.2

Mantra ID: 6.47.2

विश्वे॑ दे॒वा म॒रुत॒ इन्द्रो॑ अ॒स्मान॒स्मिन्द्वि॒तीये॒ सव॑ने॒ न ज॑ह्युः । आयु॑ष्मन्तः प्रि॒यमे॑षां॒ वद॑न्तो व॒यं दे॒वानां॑ सुम॒तौ स्या॑म ॥ (२)

ॐ

शास्त्र जिज्ञासा: इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

अथर्ववेद मन्त्र 6.47.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

॥ वैदिक संदर्भ ॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

सभी देश, दान आदि गुण वाले उनचास मरुत्‌ और उन के स्वामी इंद्र मध्याह्णृ सवन नामक सोमयाग में हम ऋत्विजों को न छोड़ें. हम उन देवों को प्रसन्न करने वाली स्तुतियां बोलते हुए देवों की अनुग्रह बुद्धि में स्थित हों. (२)

EN English Translation

We should not leave the ritvijas in the somayag called Indra Madhyahansavana and their swami Indra Midnight Sawan. Let us be situated in the grace and wisdom of the gods while speaking praises that please those gods. (2)

शास्त्र जिज्ञासा
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