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अथर्ववेद

Kanda 7 • Sukta 14 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 7 • सूक्त 14 • मन्त्र 2

7.14.2

Mantra ID: 7.14.2

याव॑न्तो मा स॒पत्ना॑नामा॒यन्तं॑ प्रति॒पश्य॑थ । उ॒द्यन्त्सूर्य॑ इव सु॒प्तानां॑ द्विष॒तां वर्च॒ आ द॑दे ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 7.14.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

शत्रुओं के मध्य में जिन शत्रुओं को मैं युद्ध के लिए आता हुआ देख रहा हूं, उन के तेज का अपहरण मैं उसी प्रकार करता हूं, जिस प्रकार सूर्य उदय के समय सोने वाले पुरुषों का तेज छीन लेते हैं. (२)

EN English Translation

In the midst of the enemies, I kidnap the glory of the enemies whom I see coming to war, just as the sun takes away the glory of the men who sleep at the time of rise. (2)

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