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अथर्ववेद

Kanda 9 • Sukta 5 • Mantra 15

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 9 • सूक्त 5 • मन्त्र 15

9.5.15

Mantra ID: 9.5.15

ए॒तास्त्वा॒जोप॑ यन्तु॒ धाराः॑ सो॒म्या दे॒वीर्घृ॒तपृ॑ष्ठा मधु॒श्चुतः॑ । स्त॑भान पृ॑थि॒वीमु॒त द्यां नाक॑स्य पृ॒ष्ठेऽधि॑ स॒प्तर॑श्मौ ॥ (१५)

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अथर्ववेद मन्त्र 9.5.15 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अज! ये घृत मिश्रित और मधु टपकाने वाली सोमरस की दिव्य धाराएं तुझे प्राप्त हों. तू सूर्य के ऊपर स्थित स्वर्ग में विराजमान हो कर पृथ्वी और द्यौ को स्तंभित कर. (१५)

EN English Translation

O Aj! May you receive these divine streams of someras that mix and honey. Sit in heaven above the sun and pillar the earth and the earth. (15)

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