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अथर्ववेद

Kanda 9 • Sukta 5 • Mantra 26

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 9 • सूक्त 5 • मन्त्र 26

9.5.26

Mantra ID: 9.5.26

पञ्च॑ रु॒क्मा ज्योति॑रस्मै भवन्ति॒ वर्म॒ वासां॑सि त॒न्वे भवन्ति । स्व॒र्गं लो॒कम॑श्नुते॒ यो॒जं पञ्चौ॑दनं॒ दक्षि॑णाज्योतिषं॒ ददा॑ति ॥ (२६)

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अथर्ववेद मन्त्र 9.5.26 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो दक्षिणा से प्रकाशित अज को पंचौदन के रूप में दान करता है, वह स्वर्गलोक का भोग करता है. उसे चमकती हुई पांच स्वर्ण मुद्राएं तथा शरीर पर वस्त्र और कवच प्राप्त होते हैं. (२६)

EN English Translation

He who donates aj published from Dakshina in the form of Panchaudan, he enjoys heaven. He receives five shining gold postures and clothes and armor on the body. (26)

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