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ऋग्वेद

Mandal 1 • Sukta 140 • Mantra / Rik 11

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 1 • सूक्त 140 • ऋचा / मन्त्र 11

1.140.11

Mantra ID: 1.140.11

इ॒दम॑ग्ने॒ सुधि॑तं॒ दुर्धि॑ता॒दधि॑ प्रि॒यादु॑ चि॒न्मन्म॑नः॒ प्रेयो॑ अस्तु ते । यत्ते॑ शु॒क्रं त॒न्वो॒३॒॑ रोच॑ते॒ शुचि॒ तेना॒स्मभ्यं॑ वनसे॒ रत्न॒मा त्वम् ॥ (११)

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ऋग्वेद मन्त्र 1.140.11 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अग्नि! कठोर काठ के ऊपर रखा हुआ जो हवि तुम्हें भली प्रकार दिया गया है, वह तुम्हें प्रिय वस्तु से भी अधिक प्रिय हो. तुम्हारे ज्वालारूपी शरीर से जो भी तेज प्रकाशित होता है, उसके साथ-साथ हमारे लिए रत्न दो. (११)

EN English Translation

O agni! The havi placed on the hard wood that has been given to you well is dearer than what is dear to you. Whatever brightness is illuminated by your flame-like body, give gems for us. (11)

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