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ऋग्वेद

Mandal 1 • Sukta 61 • Mantra / Rik 15

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 1 • सूक्त 61 • ऋचा / मन्त्र 15

1.61.15

Mantra ID: 1.61.15

अ॒स्मा इदु॒ त्यदनु॑ दाय्येषा॒मेको॒ यद्व॒व्ने भूरे॒रीशा॑नः । प्रैत॑शं॒ सूर्ये॑ पस्पृधा॒नं सौव॑श्व्ये॒ सुष्वि॑माव॒दिन्द्रः॑ ॥ (१५)

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ऋग्वेद मन्त्र 1.61.15 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अकेले ही शत्रु विजय में समर्थ एवं अनेक प्रकार के स्वामी इंद्र ने स्तोताओं से जिस प्रकार की स्तुति की इच्छा की थी, उन्हें वही स्तुति प्रदान की गई है. स्वश्च के पुत्र सूर्य के साथ युद्ध करते समय सोमरस निचोड़ने वाले एतश ऋषि को इंद्र ने बचाया. (१५)

EN English Translation

The kind of praise that Swami Indra, who is capable of conquering the enemy alone and of many kinds, has been given the same praise as he had desired from the Stotas. Indra saved the sage Etash, who squeezed the Somras while fighting with the sun, son of Swash. (15)

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