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ऋग्वेद

Mandal 1 • Sukta 95 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 1 • सूक्त 95 • ऋचा / मन्त्र 2

1.95.2

Mantra ID: 1.95.2

दशे॒मं त्वष्टु॑र्जनयन्त॒ गर्भ॒मत॑न्द्रासो युव॒तयो॒ विभृ॑त्रम् । ति॒ग्मानी॑कं॒ स्वय॑शसं॒ जने॑षु वि॒रोच॑मानं॒ परि॑ षीं नयन्ति ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 1.95.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अपने जगत्पोषण रूप कार्य में आलस्यरहित, नित्य युवा, दशों दिशाओं व मेघों में गर्भ रूप से वर्तमान वायु सब पदार्थों में वर्तमान, तीक्ष्ण तेजयुक्त एवं अतिशय यशस्वी अग्नि को उत्पन्न करती है. इसी अग्नि को सब जगह ले जाया जाता है. (२)

EN English Translation

In its world-nurturing work, lazinessless, constantly young, in the decades of direction and clouds, the present air in the womb produces the present, sharp and very successful agni in all substances. This agni is carried everywhere. (2)

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