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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 104 • Mantra / Rik 8

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 104 • ऋचा / मन्त्र 8

10.104.8

Mantra ID: 10.104.8

स॒प्तापो॑ दे॒वीः सु॒रणा॒ अमृ॑क्ता॒ याभिः॒ सिन्धु॒मत॑र इन्द्र पू॒र्भित् । न॒व॒तिं स्रो॒त्या नव॑ च॒ स्रव॑न्तीर्दे॒वेभ्यो॑ गा॒तुं मनु॑षे च विन्दः ॥ (८)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.104.8 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे शत्रुनगरियों का भेदन करने वाले इंद्र! तुमने शोभन-शब्द वाली एवं बाधारहित गंगा आदि सात नदियों द्वारा सागर को बढ़ाया, तुमने देवों और मानवों के कल्याण के लिए निन्यानवे नदियों को मार्ग प्राप्त कराया. (८)

EN English Translation

O Indra, who penetrates the enemy cities! You have extended the ocean by seven rivers like the beautiful and unhindered Ganga, etc., you have given way to ninety-nine rivers for the welfare of gods and human beings. (8)

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