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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 46 • Mantra / Rik 10

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 46 • ऋचा / मन्त्र 10

10.46.10

Mantra ID: 10.46.10

यं त्वा॑ दे॒वा द॑धि॒रे ह॑व्य॒वाहं॑ पुरु॒स्पृहो॒ मानु॑षासो॒ यज॑त्रम् । स याम॑न्नग्ने स्तुव॒ते वयो॑ धाः॒ प्र दे॑व॒यन्य॒शसः॒ सं हि पू॒र्वीः ॥ (१०)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.46.10 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे हव्य वहन करने वाले अग्नि! देवों ने तुम्हें धारण किया. हे यज्ञ योग्य अग्नि! अभिलाषाएं करने वाले मनुष्यों ने तुम्हें धारण किया. हे अग्नि! यज्ञ में मुझ स्तोता को अन्न दो. देवाभिलाषी यजमान तुमसे बहुत से यश प्राप्त करता है. (१०)

EN English Translation

O agni that carries the wind! The gods held you. O agniworthy of sacrifice! The men who desire you possessed you. O agni! Give food to my hymn in the yajna. The godly host receives many praises from you. (10)

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