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ऋग्वेद

Mandal 2 • Sukta 26 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 2 • सूक्त 26 • ऋचा / मन्त्र 2

2.26.2

Mantra ID: 2.26.2

यज॑स्व वीर॒ प्र वि॑हि मनाय॒तो भ॒द्रं मनः॑ कृणुष्व वृत्र॒तूर्ये॑ । ह॒विष्कृ॑णुष्व सु॒भगो॒ यथास॑सि॒ ब्रह्म॑ण॒स्पते॒रव॒ आ वृ॑णीमहे ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 2.26.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे वीर! ब्रह्मणस्पति की स्तुति करो. अभिमानी शत्रुओं के प्रति युद्ध के लिए प्रस्थान करो एवं शन्रुनाशक संग्राम में अपना मन दृढ़ करो. ब्रह्मणस्पति के निमित्त हव्य तैयार करो. इससे तुम्हें सीभाग्य मिलेगा. हम उनसे रक्षा की याचना करते हैं. (२)

EN English Translation

Oh, hero! Praise the Brahmanaspati. Go out to war against arrogant enemies and strengthen your mind in the destructive struggle. Prepare a havya for the sake of Brahmanaspati. This will give you the best luck. We beg them to protect. (2)

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