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ऋग्वेद

Mandal 2 • Sukta 30 • Mantra / Rik 1

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 2 • सूक्त 30 • ऋचा / मन्त्र 1

2.30.1

Mantra ID: 2.30.1

ऋ॒तं दे॒वाय॑ कृण्व॒ते स॑वि॒त्र इन्द्रा॑याहि॒घ्ने न र॑मन्त॒ आपः॑ । अह॑रहर्यात्य॒क्तुर॒पां किया॒त्या प्र॑थ॒मः सर्ग॑ आसाम् ॥ (१)

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ऋग्वेद मन्त्र 2.30.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

वर्षा करने वाले, गतिमान, सबको प्रेरणा देने वाले एवं वृत्रनाशकर्ता इंद्र के यज्ञ के लिए पानी कभी नहीं रुकता. जल का प्रवाह प्रतिदिन उसी प्रकार बहता है, जिस प्रकार वह अपनी पहली सृष्टि में हुआ था. (१)

EN English Translation

Water never stops for the yagna of Indra, the rain-doer, the dynamic, the one who inspires all and the destroyer of the vrithranasha. The flow of water flows every day in the same way as it did in its first creation. (1)

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