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ऋग्वेद

Mandal 2 • Sukta 31 • Mantra / Rik 3

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 2 • सूक्त 31 • ऋचा / मन्त्र 3

2.31.3

Mantra ID: 2.31.3

उ॒त स्य न॒ इन्द्रो॑ वि॒श्वच॑र्षणिर्दि॒वः शर्धे॑न॒ मारु॑तेन सु॒क्रतुः॑ । अनु॒ नु स्था॑त्यवृ॒काभि॑रू॒तिभी॒ रथं॑ म॒हे स॒नये॒ वाज॑सातये ॥ (३)

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ऋग्वेद मन्त्र 2.31.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अथवा समस्त लोक को देखने वाले एवं मरुद्गण की शक्ति से उत्तम कर्म करने वाले इंद्र हिंसारहित रक्षासाधनों के साथ स्वर्ग से आकर अधिक धन और अन्न को पाने के लिए अनुकूल बनें. (३)

EN English Translation

Or, indra, who sees all the people and does good deeds with the power of the deserts, should come from heaven with violence-free defense means and be friendly to get more wealth and food. (3)

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