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ऋग्वेद

Mandal 2 • Sukta 32 • Mantra / Rik 1

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 2 • सूक्त 32 • ऋचा / मन्त्र 1

2.32.1

Mantra ID: 2.32.1

अ॒स्य मे॑ द्यावापृथिवी ऋताय॒तो भू॒तम॑वि॒त्री वच॑सः॒ सिषा॑सतः । ययो॒रायुः॑ प्रत॒रं ते इ॒दं पु॒र उप॑स्तुते वसू॒युर्वां॑ म॒हो द॑धे ॥ (१)

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ऋग्वेद मन्त्र 2.32.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे द्यावापृथ्वी! यज्ञ करने के इच्छुक एवं तुम्हें प्रसन्न करने के लिए प्रयत्नशील मुझ स्तोता की रक्षा करो. सबकी अपेक्षा उत्कृष्ट अन्न वाले एवं अनेक लोगों द्वारा प्रशंसित तुम्हारी स्तुति मैं अन्नप्राप्ति की अभिलाषा से विशाल स्तोत्रों द्वारा करूंगा. (१)

EN English Translation

This is the first one! Protect my hymn willing to perform yajna and strive to please you. I will praise you with great food and admired by many people through huge hymns with the desire for food. (1)

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