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ऋग्वेद

Mandal 2 • Sukta 34 • Mantra / Rik 1

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 2 • सूक्त 34 • ऋचा / मन्त्र 1

2.34.1

Mantra ID: 2.34.1

धा॒रा॒व॒रा म॒रुतो॑ धृ॒ष्ण्वो॑जसो मृ॒गा न भी॒मास्तवि॑षीभिर॒र्चिनः॑ । अ॒ग्नयो॒ न शु॑शुचा॒ना ऋ॑जी॒षिणो॒ भृमिं॒ धम॑न्तो॒ अप॒ गा अ॑वृण्वत ॥ (१)

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ऋग्वेद मन्त्र 2.34.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

स्थिर वृक्ष आदि को चंचल करने वाले, अपनी शक्ति से सबको पराजित करने वाले, पशु के समान भयानक, अपने बल द्वारा समस्त संसार को व्याप्त करने वाले, अग्नि के समान दीप्त एवं जल से युक्त मरुद्गण घूमने वाले बादलों को छिन्न-भिन्न करके जल बरसाते हैं. (१)

EN English Translation

Those who fickle the still trees, etc., who defeat everyone with their power, are terrible as an animal, who pervade the whole world with their own force, are as bright as agni and the deserts with water, who scatter the swirling clouds and rain water. (1)

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