Popular:
ऋग्वेद

Mandal 2 • Sukta 35 • Mantra / Rik 6

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 2 • सूक्त 35 • ऋचा / मन्त्र 6

2.35.6

Mantra ID: 2.35.6

अश्व॒स्यात्र॒ जनि॑मा॒स्य च॒ स्व॑र्द्रु॒हो रि॒षः स॒म्पृचः॑ पाहि सू॒रीन् । आ॒मासु॑ पू॒र्षु प॒रो अ॑प्रमृ॒ष्यं नारा॑तयो॒ वि न॑श॒न्नानृ॑तानि ॥ (६)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

ऋग्वेद मन्त्र 2.35.6 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अपानंपात्‌ रूप सागर से उच्चैःश्रवा अश्व एवं इस संसार का जन्म हुआ है. वह अपहर्ता हिंसक के संपर्क से स्तोता की रक्षा करते हैं. दान न करने वाले झूठे लोग अपरिपक्व जल में रहते हुए भी इस अधृष्य देव को नहीं पा सकते. (६)

EN English Translation

The horse and this world is born from the sea. He protects the stota from contact with the abductor violent. The false people who do not donate cannot find this abysmal God even when they live in immature water. (6)

卐 HinduText AI