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ऋग्वेद

Mandal 3 • Sukta 30 • Mantra / Rik 7

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 3 • सूक्त 30 • ऋचा / मन्त्र 7

3.30.7

Mantra ID: 3.30.7

यस्मै॒ धायु॒रद॑धा॒ मर्त्या॒याभ॑क्तं चिद्भजते गे॒ह्यं१॒॑ सः । भ॒द्रा त॑ इन्द्र सुम॒तिर्घृ॒ताची॑ स॒हस्र॑दाना पुरुहूत रा॒तिः ॥ (७)

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ऋग्वेद मन्त्र 3.30.7 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे नित्य ऐश्वर्ययुक्त इंद्र! जिस मनुष्य के लिए तुम शक्ति धारण करते हो, वह पहले अप्राप्त गृहसंबंधी वस्तुओं को प्राप्त करता है. हे पुरुहूत! घृतादि हवि से युक्त तुम्हारी शोभन बुद्धि कल्याणकारी है तथा तुम्हारी धनदान शक्ति असीम है. (७)

EN English Translation

O eternally glorious Indra! The man for whom you possess power first acquires the undefined household objects. O Puruhoot! Your brave intellect with a lot of pride is beneficial and your wealth-giving power is limitless. (7)

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