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ऋग्वेद

Mandal 4 • Sukta 2 • Mantra / Rik 12

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 4 • सूक्त 2 • ऋचा / मन्त्र 12

4.2.12

Mantra ID: 4.2.12

क॒विं श॑शासुः क॒वयोऽद॑ब्धा निधा॒रय॑न्तो॒ दुर्या॑स्वा॒योः । अत॒स्त्वं दृश्या॑ँ अग्न ए॒तान्प॒ड्भिः प॑श्ये॒रद्भु॑ताँ अ॒र्य एवैः॑ ॥ (१२)

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ऋग्वेद मन्त्र 4.2.12 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अग्नि! मनुष्यों के घरों में रहने वाले तिरस्कारशून्य एवं क्रांतदर्शी देवों ने तुझ मेधावी से होता बनने के लिए कहा है. हे यज्ञस्वामी! तुम अपने गतिशील तेजों से इन दर्शनीय एवं आश्चर्ययुक्त देवों को देखो. (१२)

EN English Translation

O agni! The despised and revolutionary gods living in the houses of men have asked you to become the bright. O yajnaswamy! You look at these spectacular and surprising gods with their dynamic brightnesses. (12)

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