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4.25.1
को अ॒द्य नर्यो॑ दे॒वका॑म उ॒शन्निन्द्र॑स्य स॒ख्यं जु॑जोष । को वा॑ म॒हेऽव॑से॒ पार्या॑य॒ समि॑द्धे अ॒ग्नौ सु॒तसो॑म ईट्टे ॥ (१)
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ऋग्वेद मन्त्र 4.25.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
आज कौन मानवहितैषी, देवाभिलाषी एवं कामनापूर्ण मनुष्य इंद्र के साथ मित्रता करना चाहता है? सोमरस निचोड़ने वाला कौन सा यजमान अन्नि प्रज्वलित होने पर महान् तथा पार पहुंचाने वाले आश्रय के लिए इंद्र की स्तुति करता है? (१)
EN English Translation
Today, who wants to befriend indra, a man of all-time, godly and desire? Which of the hosts who squeeze the Somras praises Indra for the shelter that is great and transcendent when the queen is ignited? (1)