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ऋग्वेद

Mandal 4 • Sukta 31 • Mantra / Rik 1

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 4 • सूक्त 31 • ऋचा / मन्त्र 1

4.31.1

Mantra ID: 4.31.1

कया॑ नश्चि॒त्र आ भु॑वदू॒ती स॒दावृ॑धः॒ सखा॑ । कया॒ शचि॑ष्ठया वृ॒ता ॥ (१)

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ऋग्वेद मन्त्र 4.31.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

सदा बढ़ते हुए, पूजनीय एवं मित्ररूप इंद्र किस तर्पण के कारण हमारे सामने आएंगे? वे किस विचारपूर्ण कर्म के कारण हमारे अभिमुख होंगे? (१)

EN English Translation

For what reason will Indra, as ever-growing, revered and friendly, come before us? Because of what thoughtful deeds will they be facing us? (1)

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