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ऋग्वेद

Mandal 4 • Sukta 54 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 4 • सूक्त 54 • ऋचा / मन्त्र 2

4.54.2

Mantra ID: 4.54.2

दे॒वेभ्यो॒ हि प्र॑थ॒मं य॒ज्ञिये॑भ्योऽमृत॒त्वं सु॒वसि॑ भा॒गमु॑त्त॒मम् । आदिद्दा॒मानं॑ सवित॒र्व्यू॑र्णुषेऽनूची॒ना जी॑वि॒ता मानु॑षेभ्यः ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 4.54.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे सविता देव! तुम सर्वप्रथम यज्ञ के योग्य देवों के लिए अमरता का साधन सोम उत्पन्न करते हो. इसके बाद हव्यदाता यजमान को प्रकाशित करते हो तथा मनुष्यों को पिता, पुत्र व पौत्र के क्रम से जीवन देते हो. (२)

EN English Translation

O Savita Dev! You first produce som, the instrument of immortality for the deities worthy of yajna. After this, the givers reveal the host and give life to men in the order of the Father, the Son and the Grandson. (2)

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