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ऋग्वेद

Mandal 4 • Sukta 55 • Mantra / Rik 6

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 4 • सूक्त 55 • ऋचा / मन्त्र 6

4.55.6

Mantra ID: 4.55.6

नू रो॑दसी॒ अहि॑ना बु॒ध्न्ये॑न स्तुवी॒त दे॑वी॒ अप्ये॑भिरि॒ष्टैः । स॒मु॒द्रं न सं॒चर॑णे सनि॒ष्यवो॑ घ॒र्मस्व॑रसो न॒द्यो॒३॒॑ अप॑ व्रन् ॥ (६)

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ऋग्वेद मन्त्र 4.55.6 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे द्यावा-पृथ्वी! जिस प्रकार धन चाहने वाला व्यक्ति सागर से उसके मध्य में जाने के लिए प्रार्थना करता है, उसी प्रकार हम भी इष्ट कार्य पूरा करने हेतु अहिर्बु्य के साथ तुम्हारी स्तुति करते हैं. वे देव शब्द करती हुई नदियों को बहने योग्य बनावं. (६)

EN English Translation

This is the earth! Just as a person seeking wealth prays to go from the sea to its midst, so we also praise you with unobtrusiveness to accomplish the favored work. They should make the rivers flowing by saying the word God. (6)

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