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ऋग्वेद

Mandal 5 • Sukta 32 • Mantra / Rik 10

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 5 • सूक्त 32 • ऋचा / मन्त्र 10

5.32.10

Mantra ID: 5.32.10

न्य॑स्मै दे॒वी स्वधि॑तिर्जिहीत॒ इन्द्रा॑य गा॒तुरु॑श॒तीव॑ येमे । सं यदोजो॑ यु॒वते॒ विश्व॑माभि॒रनु॑ स्व॒धाव्ने॑ क्षि॒तयो॑ नमन्त ॥ (१०)

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ऋग्वेद मन्त्र 5.32.10 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

दीप्तिशाली एवं स्वयं रुका हुआ स्वर्ग इंद्र के सामने नीचा हो जाता है. धरती कामनापूर्ण नारी के समान इंद्र को आत्मसमर्पण करती है. इंद्र जब अपनी शक्ति को सभी प्रजाओं में मिला देते हैं, तब लोग बलशाली इंद्र के सामने क्रमपूर्वक झुकते हैं. (१०)

EN English Translation

The glorious and self-stalled heaven goes down before Indra. The earth surrenders to Indra like a desireful woman. When Indra merges his power among all the people, people bow down in order to the mighty Indra. (10)

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