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ऋग्वेद

Mandal 5 • Sukta 32 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 5 • सूक्त 32 • ऋचा / मन्त्र 2

5.32.2

Mantra ID: 5.32.2

त्वमुत्सा॑ँ ऋ॒तुभि॑र्बद्बधा॒नाँ अरं॑ह॒ ऊधः॒ पर्व॑तस्य वज्रिन् । अहिं॑ चिदुग्र॒ प्रयु॑तं॒ शया॑नं जघ॒न्वाँ इ॑न्द्र॒ तवि॑षीमधत्थाः ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 5.32.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे वज्र के स्वामी इंद्र! तुम वर्षा ऋतु में बंधे हुए मेघों को मुक्त करो एवं पर्वत को शक्तिसंपन्न बनाओ. हे शक्तिशाली इंद्र! तुमने जल में सोए हुए वृत्र को मारा एवं अपनी शक्ति को प्रसिद्ध बनाया. (२)

EN English Translation

O Lord Indra of Vajra! You free the clouds bound in the rainy season and make the mountain powerful. O mighty Indra! You hit the vitter sleeping in the water and made your power famous. (2)

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