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ऋग्वेद

Mandal 5 • Sukta 34 • Mantra / Rik 3

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 5 • सूक्त 34 • ऋचा / मन्त्र 3

5.34.3

Mantra ID: 5.34.3

यो अ॑स्मै घ्रं॒स उ॒त वा॒ य ऊध॑नि॒ सोमं॑ सु॒नोति॒ भव॑ति द्यु॒माँ अह॑ । अपा॑प श॒क्रस्त॑त॒नुष्टि॑मूहति त॒नूशु॑भ्रं म॒घवा॒ यः क॑वास॒खः ॥ (३)

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ऋग्वेद मन्त्र 5.34.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो यजमान महान्‌ इंद्र के लिए रात-दिन सोमरस निचोड़ते हैं, वे दीप्तिशाली बनते हैं. जो लोग धर्मकार्य करना चाहते हैं, शोभन अलंकार आदि धारण करते हैं, किंतु धनवान्‌ होकर भी बुरे लोगों को अपना मित्र बनाते हैं, शक्तिशाली इंद्र ऐसे लोगों का त्याग कर देते हैं. (३)

EN English Translation

The hosts who squeeze the Somras day and night for the Great Indra become radiant. Those who want to do righteous work, wear shobhan ornaments, etc., but even when they are rich, make bad people their friends, the powerful Indra abandons such people. (3)

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