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5.43.7
अ॒ञ्जन्ति॒ यं प्र॒थय॑न्तो॒ न विप्रा॑ व॒पाव॑न्तं॒ नाग्निना॒ तप॑न्तः । पि॒तुर्न पु॒त्र उ॒पसि॒ प्रेष्ठ॒ आ घ॒र्मो अ॒ग्निमृ॒तय॑न्नसादि ॥ (७)
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ऋग्वेद मन्त्र 5.43.7 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
मेधावी ऋत्विजों ने यज्ञ की कामना से हव्यपात्र अग्नि के ऊपर रख दिया है. वह ऐसा जान पड़ता है कि पिता की गोद में पुत्र हो अथवा मोटा पशु आग में तपाया जा रहा हो. (७)
EN English Translation
The meritorious ritvijs have placed the havyapatra on top of the agni with the wish of yajna. It seems that there is a son in the father's lap or a fat animal is being burnt in the agni. (7)