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ऋग्वेद

Mandal 5 • Sukta 48 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 5 • सूक्त 48 • ऋचा / मन्त्र 2

5.48.2

Mantra ID: 5.48.2

ता अ॑त्नत व॒युनं॑ वी॒रव॑क्षणं समा॒न्या वृ॒तया॒ विश्व॒मा रजः॑ । अपो॒ अपा॑ची॒रप॑रा॒ अपे॑जते॒ प्र पूर्वा॑भिस्तिरते देव॒युर्जनः॑ ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 5.48.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

क्या उषाएं ऋत्विजों द्वारा धारण करने योग्य ज्ञान का विस्तार करती हैं? वे एक रूप वाली आवरण शक्ति से सारे संसार को ढक लेती हैं. देवों की अभिलाषा करने वाले लोग पूर्ववर्तिनी एवं भविष्य में आने वाली उषाओं को छोड़कर सामने उपस्थित वर्तमान उषाओं से अज्ञान को लांघते हैं. (२)

EN English Translation

Do the ushas expand the knowledge that the ritwijs hold? They cover the whole world with a form of cover power. The people who desire the gods, except for the predecessors and the future usha, violate ignorance from the present usha present in front of them. (2)

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