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ऋग्वेद

Mandal 5 • Sukta 63 • Mantra / Rik 3

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 5 • सूक्त 63 • ऋचा / मन्त्र 3

5.63.3

Mantra ID: 5.63.3

स॒म्राजा॑ उ॒ग्रा वृ॑ष॒भा दि॒वस्पती॑ पृथि॒व्या मि॒त्रावरु॑णा॒ विच॑र्षणी । चि॒त्रेभि॑र॒भ्रैरुप॑ तिष्ठथो॒ रवं॒ द्यां व॑र्षयथो॒ असु॑रस्य मा॒यया॑ ॥ (३)

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ऋग्वेद मन्त्र 5.63.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे परम सुशोभित, उग्र, जल बरसाने वाले, धरती तथा आकाश के स्वामी एवं सबको देखने वाले मित्र व वरुण! तुम सुंदर मेघों के साथ हमारी स्तुति सुनने को आओ एवं मेघ के सामर्थ्य से आकाश से जल बरसाओ. (३)

EN English Translation

O the most adorned, the fierce, the one who rains water, the lord of the earth and the sky, and the friends and Varuna who see all! Come to hear Our praise with the beautiful clouds and pour out water from the sky by the power of the cloud. (3)

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