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ऋग्वेद

Mandal 5 • Sukta 87 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 5 • सूक्त 87 • ऋचा / मन्त्र 2

5.87.2

Mantra ID: 5.87.2

प्र ये जा॒ता म॑हि॒ना ये च॒ नु स्व॒यं प्र वि॒द्मना॑ ब्रु॒वत॑ एव॒याम॑रुत् । क्रत्वा॒ तद्वो॑ मरुतो॒ नाधृषे॒ शवो॑ दा॒ना म॒ह्ना तदे॑षा॒मधृ॑ष्टासो॒ नाद्र॑यः ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 5.87.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

एवयामरुत्‌ ऋषि महान्‌ विष्णु के साथ उत्पन्न होने वाले एवं यज्ञज्ञान के स्वयं ज्ञाता मरुतों की स्तुति करते हैं. हे मरुतो! तुम्हारा बल कर्मफल देने वाला एवं अपराजेय है. तुम पर्वतों के समान स्थिर हो. (२)

EN English Translation

The sage Avyamaruta praises the maruts who are born with the great Vishnu and who know themselves of yajnagyan. O Maruto! Your force is a work-giving and unbeatable. You are as stable as the mountains. (2)

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