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6.15.1
इ॒ममू॒ षु वो॒ अति॑थिमुष॒र्बुधं॒ विश्वा॑सां वि॒शां पति॑मृञ्जसे गि॒रा । वेतीद्दि॒वो ज॒नुषा॒ कच्चि॒दा शुचि॒र्ज्योक्चि॑दत्ति॒ गर्भो॒ यदच्यु॑तम् ॥ (१)
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ऋग्वेद मन्त्र 6.15.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
हे भरद्वाज! तुम प्रातःकाल जागने वाले, प्रजाओं के रक्षक, सदा गतिशील एवं स्वतः पवित्र अग्नि को स्तुतियों द्वारा भली-भांति प्रसन्न करो. अग्नि सदा द्युलोक से यज्ञ में आते हैं एवं दोषरहित हव्य को खाते हैं. (१)
EN English Translation
O Lord! May you please the one who wakes up in the morning, the protector of the people, the ever-moving and self-sufficient holy agni with praises. Agni always comes to the yajna from Dyulok and eats the faultless havya. (1)