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6.22.5
तं पृ॒च्छन्ती॒ वज्र॑हस्तं रथे॒ष्ठामिन्द्रं॒ वेपी॒ वक्व॑री॒ यस्य॒ नू गीः । तु॒वि॒ग्रा॒भं तु॑विकू॒र्मिं र॑भो॒दां गा॒तुमि॑षे॒ नक्ष॑ते॒ तुम्र॒मच्छ॑ ॥ (५)
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ऋग्वेद मन्त्र 6.22.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
यज्ञकर्म करने वाले एवं गुणवर्णनयुक्त वाणी वाले यजमान वज्रधारी, रथ पर बैठने वाले, अनेक यज्ञों को स्वीकार करने वाले एवं अनेक यज्ञों के करने हेतु शक्ति देने वाले इंद्र की पूजा करते हैं. वह यजमान सुख प्राप्त करके शत्रु को ललकारता है. (५)
EN English Translation
The yagyakas and the hosts of the virtuous voice worship Indra, the vajradhari, those who sit on the chariot, those who accept many yagnas and give the power to perform many yajnas. He challenges the enemy by attaining host pleasures. (5)