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ऋग्वेद

Mandal 6 • Sukta 31 • Mantra / Rik 4

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 6 • सूक्त 31 • ऋचा / मन्त्र 4

6.31.4

Mantra ID: 6.31.4

त्वं श॒तान्यव॒ शम्ब॑रस्य॒ पुरो॑ जघन्थाप्र॒तीनि॒ दस्योः॑ । अशि॑क्षो॒ यत्र॒ शच्या॑ शचीवो॒ दिवो॑दासाय सुन्व॒ते सु॑तक्रे भ॒रद्वा॑जाय गृण॒ते वसू॑नि ॥ (४)

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ऋग्वेद मन्त्र 6.31.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे इंद्र! तुमने शंबर असुर की सौ अजेय नगरियों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था. हे बुद्धिमान्‌ एवं निचुड़े हुए सोमरस द्वारा खरीदे गए इंद्र! तुमने सोमरस निचोड़ने वाले दिवोदास को बुद्धिमत्तापूर्वक धन दिया एवं स्तुति करने वाले भरद्वाज को संपत्तियां दीं. (४)

EN English Translation

O Indra! You destroyed and corrupted a hundred invincible cities of Sambar Asura. O Indra bought by the wise and unscrupulous Somers! You wisely gave wealth to Divodas who squeezed the Somras and gave the properties to Bharadwaj, who had praised him. (4)

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