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ऋग्वेद

Mandal 6 • Sukta 50 • Mantra / Rik 15

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 6 • सूक्त 50 • ऋचा / मन्त्र 15

6.50.15

Mantra ID: 6.50.15

ए॒वा नपा॑तो॒ मम॒ तस्य॑ धी॒भिर्भ॒रद्वा॑जा अ॒भ्य॑र्चन्त्य॒र्कैः । ग्ना हु॒तासो॒ वस॒वोऽधृ॑ष्टा॒ विश्वे॑ स्तु॒तासो॑ भूता यजत्राः ॥ (१५)

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ऋग्वेद मन्त्र 6.50.15 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मेरे पुत्र अर्थात्‌ भरद्वाजगोत्रीय ऋषि पूजायोग्य मंत्रों के द्वारा देवों की स्तुति करते हैं. हे यज्ञपात्र देवो! तुम हव्य द्वारा आहूत, निवासस्थान देने वाले, अपराजेय एवं देवपत्नियों के साथ पूजे जाते हो. (१५)

EN English Translation

My son i.e. Bharadwajagotriya Rishi praises the gods through worshipable mantras. O god of yajnapatra! You are worshiped by Havya, the abode-giver, the invincible and the devaswives. (15)

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