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ऋग्वेद

Mandal 7 • Sukta 4 • Mantra / Rik 8

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 7 • सूक्त 4 • ऋचा / मन्त्र 8

7.4.8

Mantra ID: 7.4.8

न॒हि ग्रभा॒यार॑णः सु॒शेवो॒ऽन्योद॑र्यो॒ मन॑सा॒ मन्त॒वा उ॑ । अधा॑ चि॒दोकः॒ पुन॒रित्स ए॒त्या नो॑ वा॒ज्य॑भी॒षाळे॑तु॒ नव्यः॑ ॥ (८)

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ऋग्वेद मन्त्र 7.4.8 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अन्य से उत्पन्न पुत्र प्रसन्नता एवं सुख देने वाला होने पर भी मन से पुत्ररूप में ग्रहण नहीं होता. वह अपने ही स्थान पर पहुंच जाता है. अन्न का स्वामी, शत्रुओं को हराने वाला एवं नव उत्पन्न पुत्र हमारे समीप आवे. (८)

EN English Translation

Even if the son born of others is a giver of happiness and happiness, the mind does not take it as a son. He reaches his own place. May the lord of food, the defeater of enemies and the newly born son come to us. (8)

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