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ऋग्वेद

Mandal 8 • Sukta 18 • Mantra / Rik 15

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 8 • सूक्त 18 • ऋचा / मन्त्र 15

8.18.15

Mantra ID: 8.18.15

पा॒क॒त्रा स्थ॑न देवा हृ॒त्सु जा॑नीथ॒ मर्त्य॑म् । उप॑ द्व॒युं चाद्व॑युं च वसवः ॥ (१५)

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ऋग्वेद मन्त्र 8.18.15 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे निवासस्थानदाता आदित्य देवो! तुम परिपक्व ज्ञान वाले हो. तुम अपने मन में कपटी और कपटहीन-दोनों प्रकार के लोगों को जानते हो. (१५)

EN English Translation

O lord aditya devo! You're having mature knowledge. You know both the deceitful and the insidious people in your mind. (15)

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