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ऋग्वेद

Mandal 8 • Sukta 27 • Mantra / Rik 15

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 8 • सूक्त 27 • ऋचा / मन्त्र 15

8.27.15

Mantra ID: 8.27.15

प्र वः॑ शंसाम्यद्रुहः सं॒स्थ उप॑स्तुतीनाम् । न तं धू॒र्तिर्व॑रुण मित्र॒ मर्त्यं॒ यो वो॒ धाम॒भ्योऽवि॑धत् ॥ (१५)

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ऋग्वेद मन्त्र 8.27.15 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे द्रोहरहित देवो! स्तुतियों के आधार पर यज्ञ में मैं तुम्हारी भली प्रकार स्तुति करता हूं. हे वरुण एवं मित्र! तुम्हारे शरीर की वृद्धि के लिए जो हवि धारण करता है, उसे शत्रु बाधा नहीं पहुंचाते. (१५)

EN English Translation

O god without hate! On the basis of praises, I praise you well in the yajna. Hey Varun and my friend! Enemies do not hinder what you hold for the growth of your body. (15)

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