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ऋग्वेद

Mandal 8 • Sukta 51 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 8 • सूक्त 51 • ऋचा / मन्त्र 5

8.51.5

Mantra ID: 8.51.5

धृ॒ष॒तश्चि॑द्धृ॒षन्मनः॑ कृ॒णोषी॑न्द्र॒ यत्त्वम् । ती॒व्रैः सोमैः॑ सपर्य॒तो नमो॑भिः प्रति॒भूष॑तो भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑ ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 8.51.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे इंद्र! तुम्हारा मन अतिशय शत्रुधर्षक है. तुम नशीले सोमों द्वारा सेवा करने वाले एवं नमस्कारों द्वारा अलंकृत करने वाले यजमान को असीम फल देते हो. इंद्र के दान कल्याण करने वाले हैं. (५)

EN English Translation

O Indra! Your mind is very hostile. You give boundless fruits to the host who serves by intoxicating mons and embellishes with greetings. Indra's donations are welfare-doers. (5)

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