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ऋग्वेद

Mandal 8 • Sukta 55 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 8 • सूक्त 55 • ऋचा / मन्त्र 2

8.55.2

Mantra ID: 8.55.2

न यं दु॒ध्रा वर॑न्ते॒ न स्थि॒रा मुरो॒ मदे॑ सुशि॒प्रमन्ध॑सः । य आ॒दृत्या॑ शशमा॒नाय॑ सुन्व॒ते दाता॑ जरि॒त्र उ॒क्थ्य॑म् ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 8.55.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

दुर्धर्ष असुर, स्थिरदेव एवं मरणशील मनुष्य युद्ध में जिस इंद्र का निवारण नहीं कर सकते, ऐसे इंद्र सोमरस पीने के कारण उत्पन्न होने वाला आनंद पाने के लिए अपने स्तोता को प्रशंसनीय धन देते हैं. (२)

EN English Translation

The unfortunate asuras, the steady god and the dying man, the Indra, who cannot be solved in the war, give praiseworthy money to his hymns to get the joy that arises out of drinking somers. (2)

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