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ऋग्वेद

Mandal 8 • Sukta 57 • Mantra / Rik 11

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 8 • सूक्त 57 • ऋचा / मन्त्र 11

8.57.11

Mantra ID: 8.57.11

यस्य॑ ते स्वा॒दु स॒ख्यं स्वा॒द्वी प्रणी॑तिरद्रिवः । य॒ज्ञो वि॑तन्त॒साय्यः॑ ॥ (११)

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ऋग्वेद मन्त्र 8.57.11 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे वज्रधारी इंद्र! तुम्हारी मित्रता एवं धनादि का निर्माण अत्यंत हर्षकारक है. तुम्हारा यज्ञ विशेषरूप से विस्तृत करने योग्य है. (११)

EN English Translation

O thunderbolt Indra! The creation of your friendship and wealth is very joyful. Your yajna is especially elaborateable. (11)

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