Popular:
ऋग्वेद

Mandal 8 • Sukta 58 • Mantra / Rik 17

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 8 • सूक्त 58 • ऋचा / मन्त्र 17

8.58.17

Mantra ID: 8.58.17

तं घे॑मि॒त्था न॑म॒स्विन॒ उप॑ स्व॒राज॑मासते । अर्थं॑ चिदस्य॒ सुधि॑तं॒ यदेत॑व आव॒र्तय॑न्ति दा॒वने॑ ॥ (१७)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

ऋग्वेद मन्त्र 8.58.17 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हव्य-अन्न धारण करने वाले लोग इस प्रकार विराजमान इंद्र की उपासना करते हैं. जब इंद्र को चलकर स्वयं आने एवं दान के योग्य स्तुतियां प्रेरित करती हैं, तब इंद्र का भली प्रकार स्थापित धन प्राप्त होता है. (१७)

EN English Translation

The people who wear the havan-annads worship indra sitting in this way. When Indra is inspired by walking and praising himself to come and give, indra's well-established wealth is obtained. (17)

卐 HinduText AI