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ऋग्वेद

Mandal 8 • Sukta 85 • Mantra / Rik 7

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 8 • सूक्त 85 • ऋचा / मन्त्र 7

8.85.7

Mantra ID: 8.85.7

वृ॒त्रस्य॑ त्वा श्व॒सथा॒दीष॑माणा॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॑जहु॒र्ये सखा॑यः । म॒रुद्भि॑रिन्द्र स॒ख्यं ते॑ अ॒स्त्वथे॒मा विश्वाः॒ पृत॑ना जयासि ॥ (७)

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ऋग्वेद मन्त्र 8.85.7 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे इंद्र! जो विश्वेदेव तुम्हारे मित्र थे, उन्होंने वृत्र असुर की सांस से भयभीत होकर तुम्हें छोड़ दिया था. उस समय मरुतों के साथ तुम्हारी मित्रता स्थापित हुई उसके बाद तुमने सभी शत्रुसेनाओं को जीत लिया. (७)

EN English Translation

O Indra! Viswedev, who was your friend, had left you fearful of the breath of the Vrithra Asura. At that time your friendship with the Maruts was established, after that you conquered all the enemy armies. (7)

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