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सामवेद

Chapter / Prapathak 10 • Dashati / Sukta 3 • Mantra 2

Samaveda (सामवेद)

सामवेद • प्रपाठक / अध्याय 10 • दशती / सूक्त 3 • मन्त्र 2

10.3.2

Mantra ID: 10.3.2

तरत्समुद्रं पवमान ऊर्मिणा राजा देव ऋतं बृहत् । अर्षा मित्रस्य वरुणस्य धर्मणा प्र हिन्वान ऋतं बृहत् ॥ (२)

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सामवेद मन्त्र 10.3.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे सोम! आप पवित्र, लहरदार, विशाल व राजा हैं. आप को मित्र और वरुण देव के पीने के लिए यज्ञ में स्थापित किया जाता है. (२)

EN English Translation

O Mon! You are holy, wavy, vast and king. You are established in the yagna for the drinking of friend and Varun Dev. (2)

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