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सामवेद

Chapter / Prapathak 16 • Dashati / Sukta 10 • Mantra 1

Samaveda (सामवेद)

सामवेद • प्रपाठक / अध्याय 16 • दशती / सूक्त 10 • मन्त्र 1

16.10.1

Mantra ID: 16.10.1

श्रायन्त इव सूर्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत । वसूनि जातो जनिमान्योजसा प्रति भागं न दीधिमः ॥ (१)

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सामवेद मन्त्र 16.10.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे यजमानो! इंद्र उसी तरह प्रचुर वैभव को बांटते हैं, जैसे सूर्य किरणों को (अपने में) बांटते हैं. हम उन की कृपा से वैसे ही धन पाते हैं, जैसे पिता की कृपा से हम उन से संपत्ति का हिस्सा पाते हैं. (१)

EN English Translation

O hosts! Indra distributes abundant splendor in the same way as the sun distributes the rays (in himself). We get wealth by his grace, just as by the grace of the Father we get a share of the property from him. (1)

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