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सामवेद

Chapter / Prapathak 16 • Dashati / Sukta 12 • Mantra 5

Samaveda (सामवेद)

सामवेद • प्रपाठक / अध्याय 16 • दशती / सूक्त 12 • मन्त्र 5

16.12.5

Mantra ID: 16.12.5

यश्चिद्धि त्वा बहुभ्य आ सुतावाँ आविवासति । उग्रं तत्पत्यते शव इन्द्रो अङ्ग ॥ (५)

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सामवेद मन्त्र 16.12.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे इंद्र! लाखों में से जो कोई यजमान सोमयज्ञ से आप को भजता है, आप उसे जल्दी ही ओजस्वी बना देते हैं. (५)

EN English Translation

O Indra! Out of the millions, any host who worships you with somayagya, you quickly make him energetic. (5)

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