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सामवेद

Chapter / Prapathak 17 • Dashati / Sukta 3 • Mantra 1

Samaveda (सामवेद)

सामवेद • प्रपाठक / अध्याय 17 • दशती / सूक्त 3 • मन्त्र 1

17.3.1

Mantra ID: 17.3.1

सूर्यस्येव रश्मयो द्रावयित्नवो मत्सरासः प्रसुतः साकमीरते । तन्तुं ततं परि सर्गास आशवो नेन्द्रादृते पवते धाम किं चन ॥ (१)

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सामवेद मन्त्र 17.3.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

सोम की धाराएं द्रवित होती हुई पात्र में सूर्य की किरणों की तरह फैल रही हैं. इंद्र के अलावा वे किसी अन्य को नहीं मिलती. (१)

EN English Translation

The currents of Soma are spreading like the rays of the sun in the moving vessel. Apart from Indra, he does not meet anyone else. (1)

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