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सामवेद

Chapter / Prapathak 18 • Dashati / Sukta 5 • Mantra 4

Samaveda (सामवेद)

सामवेद • प्रपाठक / अध्याय 18 • दशती / सूक्त 5 • मन्त्र 4

18.5.4

Mantra ID: 18.5.4

साकमुक्षो मर्जयन्त स्वसारो दश धीरस्य धीतयो धनुत्रीः । हरिः पर्यद्रवज्जाः सूर्यस्य द्रोणं ननक्षे अत्यो न वाजी ॥ (४)

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सामवेद मन्त्र 18.5.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

सोमरस दिव्य, पवित्र और हरित आभा वाला है. सूर्य की किरणों से शुद्ध हो कर वह द्रोणकलश में जाता है. वह घोड़े की तरह वेगवान हो कर कलश में जाता है. दस अंगुलियां उस को मसलमसल कर शुद्ध बनाती हैं. (४)

EN English Translation

Someras is divine, sacred and has a green aura. After being purified from the rays of the sun, he goes to Dronakalash. He goes to the urn like a horse. Ten fingers make it pure by massaging it. (4)

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