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सामवेद

Chapter / Prapathak 6 • Dashati / Sukta 3 • Mantra 5

Samaveda (सामवेद)

सामवेद • प्रपाठक / अध्याय 6 • दशती / सूक्त 3 • मन्त्र 5

6.3.5

Mantra ID: 6.3.5

ते मन्वत प्रथमं नाम गोनां त्रिः सप्त परमं नाम जनान् । ता जानतीरभ्यनूषत क्षा आविर्भुवन्नरुणीर्यशसा गावः ॥ (५)

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सामवेद मन्त्र 6.3.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

ऋषियों ने सब से पहले यह जाना कि वाणी के शब्द पूजनीय हैं. उस के बाद उन्होंने सात के तिगुने यानी इक्कीस छन्दों में स्तोत्र होते हैं, यह ज्ञान प्राप्त किया. उस के बाद वाणी से उषा की स्तुति की. उस के बाद सूर्य के तेज के साथ ही प्रकाशमान अन्य स्तुतियां (वाणियां) उत्पन्न हुई. (५)

EN English Translation

The sages first of all learned that the words of speech are revered. After that, he gained the knowledge that there are hymns in three times of seven i.e. twenty-one verses. After that, along with the brightness of the sun, other praises (vanis) were born. (5)

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