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सामवेद

Chapter / Prapathak 9 • Dashati / Sukta 5 • Mantra 8

Samaveda (सामवेद)

सामवेद • प्रपाठक / अध्याय 9 • दशती / सूक्त 5 • मन्त्र 8

9.5.8

Mantra ID: 9.5.8

मनीषिभिः पवते पूर्व्यः कविर्नृभिर्यतः परि कोशाँ असिष्यदत् । त्रितस्य नाम जनयन्मधु क्षरन्निन्द्रस्य वायूँ सख्याय वर्धयन् ॥ (८)

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सामवेद मन्त्र 9.5.8 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

सोम पवित्र, अपूर्व व कवि हैं. मनीषी और मनुष्य आप को परिष्कृत करते हैं. आप तीनों सवनों में इंद्र की प्रसिद्धि फैलाते हैं. सोम इंद्र को तृप्ति देते हैं. सोम वायु की मित्रता की बढ़ोतरी के लिए प्रवाहित होते हैं. (८)

EN English Translation

Som is pavitra, apoorva and a poet. Mystics and human beings refine you. You spread indra's fame among the three savanas. Som gives satiety to Indra. Soma flows to increase the friendliness of the air. (8)

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