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Katha Upanishad (Kathopanishad) 3.14
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४ ॥
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उपनिषद मन्त्र संख्या 14 का आध्यात्मिक रहस्य