Popular:

कठोपनिषद् • वल्ली 4, मन्त्र 14

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 4 • मन्त्र 14
भेदापवाद

Katha Upanishad (Kathopanishad) 4.14

Mantra: 4.14 [Kathopanishad_4.14]

यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति। एवं धर्मान्पृथक्पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥ १४॥

卐

HinduText AI से इस उपनिषद मन्त्र का ब्रह्मज्ञान समझें

उपनिषद मन्त्र संख्या 14 का आध्यात्मिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जिस प्रकार ऊँचे स्थानमें बरसा हुआ जल पर्वतोंमें (पर्वतीय
निम्न देशोंमें) बह जाता है उसी प्रकार आत्माओंको पृथक्-पृथक्
देखकर जीव उन्हींको (भिन्नात्मत्वको ही) प्राप्त होता है ॥ १४॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 यथोदकं दुर्गे दुर्गमे देश उच्छ्रिते वृष्टं सिक्तं पर्वतेषु पर्वतवत्सु निम्नप्रदेशेषु विधावति विकीर्णं सद्धिनश्यति एवं धर्मान् आत्मनो भिन्नान्पृथक्पश्यन्पृथग् एव प्रतिशरीरं पश्यं- स्तानेव शरीरभेदानुवर्तिनोऽनुविधावति। शरीरभेदमेव पृथक्पुनः पुनः प्रतिपद्यत इत्यर्थः ॥ १४ ॥ 【भाष्यार्थ】 जिस प्रकार दुर्ग—दुर्गम स्थान अर्थात् ऊँचाईपर बरसा हुआ जल पर्वतों--पर्वतीय निम्न प्रदेशोंमें फैलकर नष्ट हो जाता है उसी प्रकार धर्मों अर्थात् आत्माओंको पृथक्—प्रत्येक शरीरमें भिन्न-भिन्न देखनेवाला मनुष्य उन्हीं--शरीरभेदका अनुसरण करनेवालोंकी ओर ही जाता है, अर्थात् बारम्बार भिन्न-भिन्न शरीरभेदको ही प्राप्त होता है ॥ १४ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 यस्य पुनर्विद्यावतो विध्वस्तोपाधिकृतभेददर्शनस्य विशुद्धविज्ञानघनैकरसमद्वयमात्मानं पश्यतो विजानतो मुनेर्मनन- शीलस्य आत्मस्वरूपं कथं सम्भवतीत्युच्यते— 【भाष्यार्थ】 जो विद्वान् है, जिसकी उपाधिकृत भेददृष्टि नष्ट हो गयी है और जो एकमात्र विशुद्धविज्ञानघनैकरस अद्वितीय आत्माको ही देखनेवाला है उस विज्ञानी मुनि—मननशीलका आत्मा कैसा होता है? यह बतलाया जाता है—
卐 HinduText AI